जून 27, 2014

हिज्र का मौसम बुरा था



चांद खिड़की पर खड़ा था
मगर अंधेरा बड़ा था

चांदनी थी कसमसाती
रात का पहरा कड़ा था

उन चरागों को कहें क्या
ज़ोर जिनका इक ज़रा था

जब सुलगती थी हवा भी
हिज्र का मौसम बुरा था

पुराना इक ख़त गुलाबी
मेज़ पर औंधा पड़ा था

टीस रह रह कर उठी थी
जख्म अब तक भी हरा था

नींद पलकों से उड़ी थी
रंग ख्वाबों का उड़ा था

इस अंधेरी रात से पर
भोर का सपना जुड़ा था

17 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी बहर में प्यारी गज़ल... जो मुझे बहुत करीब से जानते हैं उन्हें पता है कि मैं इस प्रकार की ग़ज़लों को इर्ष्या से देखता हूँ, क्योंकि मैं चाहकर भी इस बहर में गज़ल नहीं कह पाता.
    सारे अशार लाजवाब हैं... ज़रा सा शिल्प में भटकाव है, समेट लिया तो सुन्दरता और बढ जाएगी! मेरी ओर से बहुत सुन्दर ग़ज़ल!

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    1. हौसलाअफज़ाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। उससे भी ज्यादा शुक्रिया कमियां बताने का। और कमियों का जिक्र यहीं कमेंट में कर दिया करें। अभी सीख ही रही हूं, ढेर सारी कमियां होती हैं। मुझे अच्छा लगता है जब कोई बिना समझे वाह करने की बजाय कमजोरियां बताए। यहां लगाने का मकसद ही यही होता है कि अनुभवी लोगों से कुछ सीखने को मिले। वरना तो गोल-गोल ही घूमते रहेंगे। आपका संशोधन बहुत बढ़िया था। उन संशोधनों के साथ ग़ज़ल को फेसबुक पर चस्पा कर दिया :)

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  2. कृपया अपने इस महत्वपूर्ण हिन्दी ब्लॉग को ब्लॉगसेतु http://www.blogsetu.com/ ब्लॉग एग्रीगेटर से जोड़कर हमें कृतार्थ करें …. धन्यवाद सहित

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  3. दीपिका जी ,सलिल जी के निर्देशानुसार गज़ल के संशोधित रूप को यहीं साथ में देतीं तो अच्छा था । वैसे बहुत बढ़िया रचना है ।

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  4. सलिल जी द्वारा संशोधित शेर -
    चांद खिड़की पर खड़ा था
    फिर भी अंधेरा बड़ा था

    उन चरागों को कहें क्या
    ज़ोर जिनका बस ज़रा था

    इक पुराना ख़त गुलाबी,
    मेज पर औंधा पड़ा था

    टीस रहरहकर उठी थी,
    ज़ख़्म भी अब तक हरा था

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  5. छोटी बहार में सुन्दर ग़ज़ल ... सलिल जी ने संवार दिए हैं शेर ... मज़ा आ गया ...

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  6. क्या दमदार शेर है. बहुत भाव भरा भी
    -जब सुलगती थी हवा भी
    हिज्र का मौसम बुरा था

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की 900 वीं बुलेटिन, ब्लॉग बुलेटिन और मेरी महबूबा - 900वीं बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. सुंदर गजल लिखी है आपने. संशोधनों के बाद वह और भी बढ गई है. मेरा अनुभव है कि गजल या कविता को यदि लिखने के बाद थोडा सा गुनगुना कर देखें तो जहाँ भी कुछ अटकाव जैसा होगा वह अनुभव कर लीजिएगा और फिर आप स्वत: संशोधन करने में सक्षम होंगी. मैं कई बार कविताओं की एडीटिंग करते समय यह तरीका अख्तियार करता हूँ.

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  9. सुकुमार भावाभिव्यक्ति को सलिल ने ज़रा सँवार दिया लालित्य और बढ़ गया - बधाई दोनो को !

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  10. इस अंधेरी रात से पर
    भोर का सपना जुड़ा था

    बेहद सुंदर रचना , बधाई स्वीकारें

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  11. चांद खिड़की पर खड़ा था
    मगर अंधेरा बड़ा था....

    wah wah bahut khoob

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  12. नींद पलकों से उड़ी थी
    रंग ख्वाबों का उड़ा था

    क्या ख़ूब लिखा है।

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  13. आप और सलिल गुरु दोनों कमाल..!

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